Kalam mein mei jaan basti hai...bas ise mat todna

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abhijeettrivedi


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: utkarshsingh utkarshsingh

प्रिय अभिजीत जी, सादर अभिवादन! आपने आज के सन्दर्भ में अपने जो भी विचार रक्खे हैं वह जरूर ही विचारणीय है ...मैं थोडा कोशिश करता हूँ आपको तसल्ली देने का... गोस्वामी तुलसीदास और अन्य कवियों ने बहुत पहले अपने विचार रख चुके हैं - जाकी रही भावना जैसी प्रभुमूरत देखी तिन तैसी!- इसलिए आप उनके किसी खास रूप पर मत जाइये ये सभी हमारे पुराने ऋषि मुनियों की कल्पना पर आधारित हैं ... पर उनका अस्तित्व है इससे किसी को शायद इनकार न होगा! आपको भी नहीं ! फिर आप उन्हें जिस रूप में चाहते हैं देखिये और पूजिए ... माँ, बाप और गुरुजन ये भी भगवान के ही रूप हैं इन्ही में आप अपने भगवान को ढूंढिए ... मिल जायेंगे! दरिद्र नारायण का भी अपने नाम सुना ही होगा उनमे भी वही अंश विराजमान हैं. इश्वर अंश जीव अविनाशी! और इन बैटन का कोई अंत नहीं है मानिये तो भगवान नहीं तो पत्थर! अपनी शंका को जरूर व्यक्त करिए इस मंच पर हर तरह के विद्वान मिलेंगे उनके आलेख भी पढ़िए ... मनन करिए, उत्तर अपने आप मिल जायेगा!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

श्री अभिजीत जी ,..सादर अभिवादन मंच पर आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ ...प्रभावी पोस्ट के लिए बहुत आभार मुझ मूरख के अनुसार भक्त भगवान के बीच यह कशमकश हमेश हुई है ,..होती रहेगी !...भगवान कहीं जाते नहीं हैं बस तटस्थ होकर देखते हैं ,..भक्त भी कम चालू नहि होता है ,..भगवान उसके हठ का भी आनंद लेते होंगे ,...परीक्षा दोतरफा होती है ,..दोनों तरफ वही खेलते हैं ,...मन का उदास होना तात्कालिक स्थिति होती है ,...मानता हूँ कि मन उनको सौंपना और उनका स्वीकार करना अहम सोपान है ...व्यक्ति अपने मन के सबसे नजदीक होता है ,..यदि उसपर काबू किया तो कभी न कभी अहंकार होगा ,..जो भक्ति को जलाने के लिए पर्याप्त है ,....बिन प्रयास उदासी दूर हो और सब मालिन्य मिटे तभी एकाकार माना जा सकता है ,...वो एक साथ सबकी सहायता भी कर सकते हैं ,....परमपिता अपनी संतानों को प्यार ही करते हैं ... इसी तरह अच्छी पोस्टों की आपसे अपेक्षा रहेगी ,....सादर अभिनन्दन

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar




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